॥ दिग्रक्षणम् ॥दिशा रक्षा-विधान कैसे करें

    दिशा रक्षा-विधान और मंत्र 

दिशा रक्षा विधान और मन्त्र












सर्व प्रथम कुछ पीला सरसों अपने दाहिने हाथ में ले साथ मौली ( रक्षा सूत्र) और साथ में कुछ द्रव्य लेकर बाये हाथ से ढके 

मंत्र

ॐ रक्षोहणं वलगहनं वैष्णवीमिदमहन्तं वलगमुत्किरामि । यम्मेनिष्टयो यममात्यो निचखानेदं महन्तं वलगमुत्किरामि ।
यम्मे समानो यम समानो निचखानेदं महन्तं वलगमुत्किरामि ।
यस्मे सबंधुर्यम सबंधुर्निचखानेद महन्तं वलगमुत्किरामि । यम्मेसजातो यमसजातो निचखानोम्कृत्याङ्किरामि ॥१॥

रक्षोहणो वो वलगहनः प्रोक्षामिवैष्णवान, रक्षोहणोवो वलगहनो व नयामिवैष्णवान्, रक्षोहणोवो वलगहनो
वस्तृणामि वैष्णवान्, रक्षोहणौवां वलगहना उपदधामि
वैष्णवी, रक्षोहणौ वां वलगहनौ पर्यूहामि वैष्णवी वैष्णव मसि वैष्णवास्त्थ ॥२॥

रक्षेसां भागोसि निरस्त $ रक्ष इदमह$ रक्षो भितिष्ठा मीदमह$ रक्षो व बाध इदमह$ रक्षो धमन्तमो नयामि
घृतेनद्  द्यावा पृथ्वी प्रोर्णु वाथां वायो वेस्तोकानामग्नि राज्यस्य वेतु स्वाहा ।स्वाहाकृते ऊर्ध्वनभ समारूतग्ङ- च्छतम ॥३॥

रक्षोहा विश्वचर्षणि रभि योनि मयोहते। द्रोणे सधस्त्थ मा
सदत् ॥४॥

अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूमि संस्थिता : । ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया ॥

अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचा : सर्वतोदिशम् । सर्वेषामवरोधेन पूजाकर्म समारभे ॥

यदत्र संस्थितं भूतं स्थान माश्रित्य सर्वत : । स्थानं त्यक्त्वा तु तत्सर्व यत्रस्थं तत्र गच्छतु ॥

भूत प्रेत पिशाचाधा अपक्रामन्तु राक्षसा : । स्थानादस्माद् व्रजन्त्वन्यत्स्वीकरोमि भुवंत्विमाम् ॥

भूतानि राक्षसा वापि येऽत्र तिष्ठन्ति केचन । ते सर्वेऽप्यप गच्छन्तु पूजा कर्म कोम्यहम् ॥

इसके बाद पीला सरसों पूर्व दिशा से क्रमशः दसों दिशाओं में बिखेरेंते जाये दशों दिशाओं में दिग्रक्षण करें । तत पाश्चात हाथ में बचा बाकी सरसों को अपने सर के चारों तरफ गिरा घुमा कर गिरा दे। 

मंत्र 


ॐ पूर्वे रक्षतु गोविन्द : आग्नेयां गरुडध्वज : । याम्यां रक्षतु वाराहो नारसिंहस्तु नैऋत्ये ॥

वारुण्या केशवो रक्षेद्वायव्यां मधुसूदन : । उत्तरो श्रीधरो रक्षेदीशाने तु गदाधर : ॥

उर्ध्व गोवर्धनो रक्षेदधस्ताच्च त्रिविक्रम : । एवं दशदिशो रक्षेद्वासुदेवो जनार्दन : ॥

प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता । दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋत्यां खड्‌गधारिणी ॥

प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी । उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी ॥

उर्ध्वं ब्रह्माणि में रक्षेद्‌धस्ताद् वैष्णवी तथा । एवं दश दिशो रखेच्चामुण्डा शव वाहना ॥

जया में चाग्रत : पातु विजया पातु पृष्ठत : । अजिता वामपार्श्वे : तु दक्षिणे चापराजिता ॥   ॥ दिग्रक्षणम् सम्पूर्ण ॥
                       

आपका मंगल हो, प्रभु कल्याण करे

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