सप्त घृत मातृका पूजन मंत्र-(Saptaghrita Matrika Pujan Mantra)

सप्त घृत मातृका पूजन मंत्र
सप्त घृत मातृका पूजन मंत्र

सप्त मातृका क्या है?

मातृका (सप्त घृत मातृका) से ही हमें ज्ञात होता हैं "माँ" । सम्पूर्ण सृष्टि की जननी आदि शक्ति मातृ गुणों का प्रतीक, ब्रह्मांड की शक्तियों का रक्षक अखण्ड(सम्पूर्ण) जगत के ऊर्जा का श्रोत जिनसे सम्पूर्ण विस्तार हैं जिसे मातृकाओं के नामों से जानतें हैं।


घृत मातृका चक्र संरचना

पूजन स्थल पर अग्निकोण के किसी वेदी पर या श्वेत वस्त्र से आच्छादित पीठ (पाटा) पर श्री लिखे तथा नीने सिन्दूर अथवा रोली से क्रमशः समानता में एक के नीचे दो उसके नीचे तीन ऐसे ही क्रमशः सात विन्दु बना लें। इसके बाद उन पर मंत्र पढ़ते हुए सातो बिन्दुओं पर घी या दूध से प्रादेशमात्र सात धारा निम्नलिखित मंत्र से दे----

सप्त घृत मातृकाओं का नाम:-

श्रीलक्ष्मार्धृतिमेधा स्वाहा प्रजा सरस्वती माङ्गल्येषु प्रपूज्यन्ते सप्तैता घृतमातर:॥

1- श्री
2- लक्ष्मी
3- धृति
4- मेधा
5- स्वाहा
6- प्रज्ञा
7- सरस्वती

सप्त घृत मातृका स्तुति:-

सौभाग्यदात्री कमलासनस्था तथा जगद्धात्री सदैव मेधा।
पुष्टिश्च श्रदाखिल लोकपूज्या सरस्वती मे वितनोतु लक्ष्मी।
ॐ भूर्भुव स्व ध्यानार्थे पुष्पाणि समर्पयामिः श्रीयादि सप्तघृतमातृकाभ्यो नमः

सप्त घृत मातृका आवाहन मंत्र सहित

श्रिय-  ॐ मनसः काममाकूतिं वाचं सत्यमशीमहि पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः। ॐ श्रिये नमः श्रियमावाहयामि स्थापयामि।
(प्रथम विन्दु पर पुष्प अक्षत छोड़कर श्री देवी का आवाहन करें।)

लक्ष्मी- ॐ श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्यावोरात्रे पार्शवे नक्षत्राणि रूपमश्विनी व्यानम्। इष्णन्त्रिषाणामुं मषाण सर्व्वलोकं मऽइषाण। ॐ लक्ष्म्यै नमः। लक्ष्मीमावाहयामि स्थापयामि ।
(दूसरी विन्दु पर अक्षत छोड़कर लक्ष्मी का 
आवाहन करें)

धृति- ॐ भद्रं कण्णेभिः शृणुयाम देवा भद्र पश्येमाक्ष भिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा र्ठ सस्तनूभिर्व्य शेमहि देवहितं यदायुः। धृत्यै नमः धृतिमावाहयामि स्थापयामि।
(तीसरी विन्दु पर अक्षत छोड़कर धृति का आवाहन करें ।)

मेधाम- ॐ मेधां मे व्वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः। मेधामिन्द्रश्च्च व्वायुरश्च मेधा धाता दधातु में स्वाहा। ॐ मेधायै नमः मेधामावाहयामि स्थापयामि।
(चौथी रेखा पर चावल छोड़कर मेधा का आवाहन करें ।)

स्वाहा- ॐ प्राणाय स्वाहा पानाय स्वाहा व्यानाय स्वाहा चक्षुषे स्वाहा श्रोत्राय स्वाहा वाचे स्वाहा मनसे स्वाहा । ॐ स्वाहायै नमः स्वाहामावाहयामि स्थापयामि।
(पाँचवी विन्दु रेखा पर चावल छोड़कर स्वाहा का आवाहन करें ।)

प्रज्ञा- ॐ आयं गौः पृश्चिरक्रमीदसदन्न्मातरं पुर पितरं न प्रयन्स्वः। ॐ प्रज्ञायै नमः प्रज्ञामावाहयामि स्थापयामि ।
(छठी विन्दु रेखा पर अक्षत छोड़कर प्रज्ञा का आवाहन करें ।)

सरस्वती- ॐ पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवति। यज्ञं व्यष्टुधियावसुः । ॐ सरस्वत्यै नमः, सरस्वतीमावाहयामि स्थापयामि । (सातवीं विन्दु रेखा पर अक्षत छोड़कर सरस्वती का आवाहन करें ।)

प्राण-प्रतिष्ठा निम्नलिखित मंत्र द्वारा :-

ऊँ एतं ते देव सवितर्यज्ञं प्राहुर्बृहस्पतये ब्रह्मणे तेन यज्ञमव तेन यज्ञपतिं तेन मामव। ऊँ मनोजूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिं यज्ञमिमं तन्नोत्वरिष्टं यज्ञ र्ठ समिमं दधातु।। विश्वेदेवा स इह मादयंतामो २ प्रतिष्ठ।

प्राण स्थिर मंत्र-

ॐ अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च। अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन॥ श्रीयादि सप्तघृत मातृके सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम्‌ ।

सप्त घृत मातृका ध्यान :-

सप्तहुं विन्दु पे सप्तहुं मातर श्री लक्ष्मी धृति मेधा माँ आओ ।
स्वाहा सुप्रभा सरस्वती मातु हमें भव सिंधु से पार लगाओ ।।
हे वसुधारा सदा वसुधा तल पे करुणामयि धार बहाओ ।
पूजा में आय सनाथ करो माँ भक्त के माथे माँ हाथ लगाओ ।।

घृत धारी मंत्र--वसोर्धारा मंत्र :--

ॐ वसो: पवित्र शतधारं वसो: पवित्रमसि सहस्त्र धारण्। देवस्त्वा सविता पुनातु वसो: पवित्रेण शतधारेण सुप्वा: काम धुक्ष्व:॥

इसके बाद गुड़के द्वारा बिन्दुओंकी रेखाओंको उपर्युक्त मन्त्र पढ़ते हुए मिलाये तदनन्तर निम्नलिखित वाक्योंका उच्चारण करते हुए प्रत्येक मातृकाका आवाहन और स्थापन करे-
अन्त में उन अन्तिम बिन्दुओं को गुड़ से मिलाकर उनकी अलग-अलग पूजा करें।

सप्त घृत मातृका पूजन विधि (सप्तघृतमातृका पूजनम्)


आपका मंगल हो, प्रभु कल्याण करे

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