वास्तु के प्रकार ,आवास और भूमि के प्रकार

वस्तु कितने प्रकार के होते है

अमर्त्याश्चैव मर्त्यता अच यत्र-तत्र वसन्ति हि ।
तद् वस्त्वति में तज्ज्ञैस्तद्भेदं वदाम्यहम्   ॥१॥

:--अर्थात--:

जो मर नहीं सकते और जिसका शरीर नाशवान (हैं जहाँ जहाँ निवास करते हैं,विद्वज्जन उसे (वास्तु) कह्ते हैं। उस निवास  स्थान के बारे में वर्णन करता हूँ। ॥१॥

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भूमिप्रासादयानानि    शयनं   च चतुर्विधम् ।
भूरेव मुख्यवस्तु स्यात्तत्र जातानि यानि हि ॥२॥

:--अर्थात--:

वास्तु चार प्रकार के होते हैं :---- भूमि, देवालय,यान एवं शयन। इसमें मुख्य वास्तु भूमि  हैं , क्योंकि सभी का प्रादुर्भाव यहीं हुआ हैं। ॥२॥




प्रासाददीनि वास्तुनि वस्तुत्वाद् वस्तु संश्रयात् ।
वस्तून्येव हि तान्येव प्रोक्तान्यस्मिन् पुरातनैः ॥३॥

:--अर्थात--:

प्रसाद अन्य वस्तुए मुल वस्तु (वास्तु ) भूमि से से उत्पत्ति होने एवं उसपर निर्भर होने के कारण वास्तु ही हैं। इसी कारण विद्वानों ने वास्तु की संज्ञा प्रदान किया है। ॥३॥

वर्ण गंध रसाकारदीक्शब्द स्पर्श नै रपि  ।
परिक्ष्यैव यथा योग्यं गृहीतावधि निश्चित ॥४॥

:--अर्थात--:

सर्व प्रथम चतुर्थ वास्तु मे मुल वास्तु पर विचार-विमर्श करना अति आवश्यक हैं। गृह (महल,भवन) के लिये भूमि परीक्षण अनिवार्य हैं। प्रथम-- वर्ण, द्वितीय-- गंध, रस ,तृतीय-- दिशा, आकृति, चतुर्थ-- शब्द, एवं स्पर्श के द्वारा परीक्षण करनी चाहिए। परीक्षण के पाश्चात् निर्माण सुरु करना चाहिए एवं आवश्यकता के अनुसार भूमि ग्रहण करना चाहिए  ॥४॥

भूमि कितने भागों में बाॅटा गया हैं

भूमि क्रमशः दो भागों में बाॅटा गया हैं

या सा भूमि रिति ख्याता वर्णानां च विशेषतः ।
द्वि विधं तत् समुदिष्टं गौणमङ्गीत्यनुक्रमात्  ॥५॥

:--अर्थात--:


क्रमशः सभी वर्ण ( ब्राह्मणादि ) ब्राह्म ज्ञानी के अनुसार भूमि का वर्णन किया गया हैं। इस अनुसार ( दृष्टि ) भूमि क्रमशः दो भागों में बाॅटा गया हैं------- गौण एवम अङ्गी है।
॥५॥


ग्रामादीन्येव गौणानि     भवन्त्यङ्गी मही मता ।
सभा शाला  प्रपा  रङ्गमण्डपं  मन्दिरं  तथा ॥६॥ 

:--अर्थात--:

ग्रामादि जो भी है वह गौण के अन्तर्गत आते हैं और भुमि अङ्गी होती हैं । सभा, शाला, प्याऊ, रङ्गमण्डप और मंदिर ( प्रासाद कहलाते हैं ) ।॥६॥
प्रासाद इति विख्यात शिबिका गिल्लिका रथम्।
स्यन्दनं   चैवमानीकं   यानमित्युच्यते बुधै ॥७॥

:--अर्थात--:

शिबिका, गिल्लिका, रथ,  स्यन्दन और आनीक को यान कहते है। जो प्रासाद नाम से विख्यात हैं। ॥७॥


मञ्चं मञ्चिलिका काष्ठं पञ्जरां फलकासनम्। पर्यङ्कं   बालपर्य्क   शयनं   चैवमादिकम् ॥८॥ 
:--अर्थात--:

शयन के सम्मिलित गुप्त रूप से   (सिंहसन),  (दीवान),  (काठ के आसन),  (पिंजरा),  (बेञ्च),  (पल्लंग) ऐ सभी शयन के अन्तर्गत, बालपर्यङ्क आदि ग्रहण किए जाते है ।॥८॥

भूप्रधान्येः

चतुर्णामधिकाराणां      भूरेवादौ  प्रवक्ष्यते । भूतानामादि भूतत्वादाधारत्वाज्जगत्स्थितेः॥९॥

:--अर्थात--:

चारो में प्रथम स्थान भूमि का कहा जाता है, क्योंकि  ( पञ्च महा भूतों) में प्रथम स्थान भूमि का है, संसार की स्थिति इसी पर आधारित है एवं भूमि ही सबका आधार है ।। ९ ।।

• वर्ण अनुरूप भूमि की प्रकार •

चतुरस्रं द्विजातीनां वस्तु श्वेतम निन्दितम् । उदुम्बरद्रुमोपेतमुत्तर प्रवणं वरम १०॥

द्विजजनो (ब्राह्मण)  के लिये  प्रशस्त भूमि-लक्षण इस प्रकार हैं- चौकोर भूमि  ( लम्बाई चौड़ाई का सामान ) हो, मिट्टी का रंग श्वेत हो,  गूलर के वृक्ष से ( उदुम्बर ) युक्त हो एवं भूमि का ढलान उत्तर दिशा की ओर रहे।। १० ।।


कषायमधुरं सभ्यक् कथितं तत् सुखप्रदम् ।
व्यासाष्टां शधिकायामं रक्तंरिक्त रसान्वितम्॥११॥

:--अर्थात--:

मधुर ‐कषाय स्वाद वाली भूमि ( ब्राह्म ज्ञानीयों के लिये ) सुखदप्रद होती है। क्षत्रियों के लिये उच्चतम भुमि के लक्षण इस प्रकार है- भूमि की जितनी चौड़ाई हो, चौड़ाई से लम्बाई आठ भाग अधिक हो, मिट्टी का रंग लाल हो एवं स्वाद में रिक्त हो ॥११॥ 


प्राङ्निम्नं तत् प्रविस्तीर्णमश्वत्थद्रुमसंयुतम् । 
प्रशस्तं भूभृतां वस्तु सर्वसम्पत्करं सदा ॥१२॥

:--अर्थात--:

ढलान जिसका पूर्व दिशा मे हो , विस्तृत हो, पीपल के वृक्ष से युक्त हो, वह भूमि राजाओं के लिये शुभप्रद एवं सर्वदा सभी प्रकार की सम्पत्ति प्रदान करने वाली कहीं गई है ॥१२॥

षडंशेनाधिकायामं पीतमम्लरसान्वितम् ।
प्लक्षद्रुम युतं पूर्वावनतं शुभदं विशाम् ॥१३।।

:--अर्थात--:

जिसकी लम्बाई, चौड़ाई से छ: भाग अधिक हो, मिट्टी  पीले रंग का हो, उसका स्वाद खट्टा हो, पाकड़  के वृक्ष से युक्त हो एवं पूर्व दिशा की ओर जिसकी ढलान हो—वह भूमि वैश्य वर्ण के लिये अतिउत्तम मानी गई है।।१३।।

चतुरंशाधिकायामं वस्तु प्राक्प्रवणान्वितम् ।
कृष्णं   तत्  कटुकरसं  न्यग्रोधद्रुमसंयुतम्  ।
प्रशस्तं शूद्रजातीनां धनधान्यसमृद्धिदम् ॥१४॥

:--अर्थात--:

जिसका लम्बाई उसके चौड़ाई से चार गुणा अधिक हो, पूर्व दिशा की ओर झुकी हुए हो, मिट्टी कृष्ण वर्ण का हो एवम स्वाद कड़वा हो, उस भूमि पर वट का वृक्ष हो। इस प्रकार की भूमि शूद्र वर्ण वालों को धन-धान्य एवं समृद्धिदायक,सुख प्रदान करने बाली होती है ।।१४।। 


एवं प्रोक्तो वस्तुभेदो द्विजानां भूपानां वैश्यकानां परेषाम् ।
योग्यं सर्वभूसुराणां सुराणांभूपानां तच्छेषयोरुक्तनीत्या॥१५॥

:--अर्थात--:

इस प्रकार चारो वर्णो ( ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों एवं शूद्रों ) के अनुसार वास्तु (भूमि )  की प्रकार का वर्णन किया गया है। देवताओ, ब्राह्मणों एवं राजाओं के लिये सभी प्रकार की भूमियाँ उपयुक्त होती है। यह उपर्युक्त मत का विकल्प है); परन्तु शेष दो वर्ण ( वैश्य एवं शूद्र ) का अपने अनुरूप भूमि का ही चयन करना चाहिये।। १५ ।।

वास्तु के प्रकार ( श्लोक-१-३)

वास्तु के अन्तर्गत जिन विषयों का अध्ययन अभिप्रेत है, उनका उल्लेख अन्य वास्तुग्रन्थों में भी प्राप्त होता है। उनमें से कुछ उल्लेखनीय प्रसङ्ग इस प्रकार हैं
(क) मानसार के अनुसार पृथिवी, भवन, यान एवं पर्यङ्क (आसन) वस्तु अथवा वास्तु है----

तैतिलाश्च नराश्चैव यस्मिन्यस्मिन् परिस्थिताः ।
तद्वस्तु सुरिभि:  प्रोक्तं यथा  वै वक्ष्यतेऽधुना ।। धरहर्म्यादि  यानं च  पर्यङ्कादि  चतुर्विधम्   ।
धरा प्रधानवस्तु      स्यात्तत्तज्जातिषु सर्वशः ।।
( ३.१-२ )

(ख) बहुमुल्य समराङ्गण सूत्रधार के अनुसार देश, पुर, निवास, सभा तथा वेश्मासन वास्तु के अन्तर्गत परिगणित हैं

देश: पुरन निवासश्च सभा वेश्मासनानि च    ।
यद्यदी दृशमन्यच्च  तत्तच्छ्रे  यस्करं मतम्    ।।
वास्तुशास्त्रादृते तस्य न स्याल्लक्षणनिश्चयः  ।
तस्माल्लोकस्य    कृपया   शास्त्रमेतदुदीर्यते ।।

(ग) विश्वकर्मा के अनुसार देवों, मनुष्यों एवं गज आदि पशुओं की निवास-भूमि एवं भवन निर्माण में प्रयुक्त इष्टका तथा शिला आदि वास्तु पद से अभिहित हैं

देवतानां नराणाञ्च गजगोवाजिनामपि      ।
निवासस्थानश्शिल्पज्ञैर्वास्तुसंज्ञमितिर्यते  ॥१॥

इष्टिका च शिला दारुरय: कीलादयोऽप्यमी  । 

वास्तुकर्मणि चान्यत्र वास्तुसंज्ञमुदीरितम् ॥६१॥

(विश्वकर्मवास्तुशास्त्र - ७)


इनके अतिरिक्त ( २.३२-४०) वास्तु के शिल्पगत भेदों में ग्राम, पुरी, खेट, के कर्वट, दुर्ग, प्रासाद, हर्म्य, न्यायशाला, सभा, कोशागार, अन्तःपुर, शस्त्रागार, क्रीडागृह, तोरण, मञ्जिक, अधिष्ठान, उपपीठ, गोपुर, सङ्कीर्णभवन, पताका, पारिभद्रक, चारों वर्णों के गृह, वेदिका, पोतिका, स्तम्भ, मण्डप, विमान एवं प्राकार आदि का वर्णन प्राप्त होता है।

वास्तु शास्त्र दिशाओं पर आधारित है, दिशाओं के बिना वास्तु शास्त्र की कल्पना नहीं की जा सकती वास्तु शास्त्र यह है । जिसमें दिशा बदल कर हम अपनी स्थिति बदल सकते हैं, आज हम वास्तु शास्त्र के रहस्य और इसकी आठ दिशाओं के बारे में चर्चा करेंगे। 

पूर्व की बात कर रहे हैं। यह दिशा अग्नि तत्व स्वामी ग्रह सूर्य की दिशा है। और स्वामी भगवान इंद्र हैं यह दिशा पुरुषों और घर के मालिक को प्रभावित करती है यदि इस दिशा को पूरी तरह से कवर किया जाना चाहिए, या इसे काट दिया जाना चाहिए, या वास्तु नियमों के प्रतिकूल होना चाहिए, यह दिशा घर के पुरुषों और मालिक को प्रभावित करती है। 

घर की दूसरी पश्चिम दिशा। यह दिशा वायु तत्व की दिशा है शनि इस दिशा के स्वामी हैं। और प्रमुख भगवान नेपच्यून। इस दिशा का प्रभाव अस्थिर और चंचल माना जाता है, पश्चिम दिशा में लक्ष्मी का मुख किसी भी घर या दुकान आदि में होता है। धन की वसूली नहीं होती है, खर्चे नष्ट होते हैं। यदि यह दिशा वास्तु के अनुसार हो तो ? स्वामी को मान-सम्मान मिला। 

तीसरी उत्तर दिशा। यह दिशा जल तत्व की दिशा है, उत्तर स्थान को मातृभूमि भी माना जाता है। इस दिशा का स्वामी बुध ग्रह है। और अधिपति भगवान कुबेर हैं। यदि इस दिशा को पूरी तरह से ढक लेना चाहिए,

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